गुरुवार, 27 नवंबर 2008

कविता का अंश

सहर ने ही किए हैं धोखे सदा

इसे ही हमको भूलना होगा ।

इसी की आस ने सपने कुचले,

सहर की राह मत देखो

सहर मिले न मिले ।

3 टिप्‍पणियां:

hindi-nikash.blogspot.com ने कहा…

वाह ... क्या बात है. बहुत गहरे दार्शनिक तत्व की और सहज शब्दों में ही संकेत किया है.बधाई.

सादर

आनंदकृष्ण, जबलपुर

मोबाइल : 09425800818

MEDIA GURU ने कहा…

kuchh nayi rachnaye prakshit kariye

प्रसन्नवदन चतुर्वेदी 'अनघ' ने कहा…

रचना बहुत अच्छी लगी।आप मेरे ब्लाग
पर आएं,आप को यकीनन अच्छा लगेगा।